जहां बर्फ से बनती थी ‘ॐ’ की आकृति, वहां अब दिखाई दे रही काली चट्टान Writer by Mohit Kumar 19-8-2026 7:10 pm वर्षों में तेजी से बढ़ी है। 2026 में यात्रा शुरू होने के बाद केवल दो महीनों में 52,441 श्रद्धालुओं के पहुंचने की जानकारी अधिकारियों ने दी थी। हालांकि मानसून के दौरान भारी बारिश, भूस्खलन और यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने जुलाई 2026 में आदि कैलाश और ओम पर्वत यात्रा को अस्थायी रूप से रोक दिया था। बढ़ता पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में इसके साथ कचरा, वाहनों की आवाजाही, सड़क निर्माण और अन्य मानवीय गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव भी समझना जरूरी है। 2024 की रिपोर्टों में स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों ने सड़क संपर्क बढ़ने के बाद वाहनों की संख्या में वृद्धि और उससे होने वाले प्रदूषण को भी पर्यावरणीय बदलावों से जोड़कर देखा था। हालांकि यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि केवल वाहनों के कारण ओम पर्वत की बर्फ गायब हुई है। वास्तविक स्थिति समझने के लिए तापमान, वर्षा, हिमपात, सौर विकिरण, हवा, काली कार्बन और स्थानीय भूगोल सहित कई कारकों का लंबे समय तक अध्ययन जरूरी है। क्या यह जलवायु परिवर्तन का संकेत है संभावना जरूर है, लेकिन किसी एक घटना को अकेले जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। जलवायु परिवर्तन का आकलन दशकों के तापमान, वर्षा, हिमपात और ग्लेशियरों से जुड़े आंकड़ों से किया जाता है। लेकिन जब किसी संवेदनशील ऊंचाई वाले क्षेत्र में बार-बार असामान्य मौसम दिखाई देने लगे, तो वह वैज्ञानिक निगरानी और विस्तृत अध्ययन का कारण जरूर बनता है। ओम पर्वत के मामले में पिछले वर्षों में बर्फ गायब होने और असामान्य सर्दी की घटनाओं ने इस चिंता को और गंभीर बनाया है। हिमालय के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ओम पर्वत ओम पर्वत धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र होने के साथ-साथ हिमालय के अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। यहां होने वाले बदलाव आसपास के जल स्रोतों, वनस्पतियों, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि ओम पर्वत को केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में नहीं देखा जाए, बल्कि इसे एक संवेदनशील हिमालयी पर्यावरण क्षेत्र मानकर वैज्ञानिक तरीके से निगरानी की जाए। अब क्या करने की जरूरत है विशेषज्ञों और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी जरूरत नियमित वैज्ञानिक निगरानी की है। इसके लिए— हर वर्ष बर्फ की मोटाई और क्षेत्रफल का रिकॉर्ड तैयार किया जाए। तापमान और वर्षा के आंकड़ों की तुलना पिछले दशकों से की जाए। हिमपात के समय और मात्रा का वैज्ञानिक अध्ययन हो। वाहनों और पर्यटन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया जाए। संवेदनशील क्षेत्रों की पर्यावरणीय क्षमता के अनुसार पर्यटन सीमित किया जाए। कचरा प्रबंधन और वाहनों की आवाजाही के लिए सख्त व्यवस्था बनाई जाए। स्थानीय लोगों के पारंपरिक मौसम संबंधी अनुभवों को भी वैज्ञानिक अध्ययन के साथ जोड़ा जाए। ‘ॐ’ की आकृति सिर्फ आस्था नहीं, हिमालय की कहानी भी है ओम पर्वत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक ‘ॐ’ आकृति है, जो बर्फ जमने के कारण स्पष्ट दिखाई देती है। जब बर्फ ही कम हो जाती है तो पर्वत की वह पहचान भी धुंधली पड़ जाती है। 2024 में बर्फ पूरी तरह गायब होने के बाद कुछ समय में बर्फ वापस आई थी। इसलिए मौजूदा स्थिति को लेकर तत्काल किसी स्थायी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन बार-बार सामने आ रहे ऐसे बदलाव यह जरूर बताते हैं कि हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों के मौसम पर गंभीर और निरंतर नजर रखने की जरूरत है। हिमालय हमें चेतावनी दे रहा है ओम पर्वत पर बर्फ का कम होना सिर्फ एक पहाड़ का बदलता रंग नहीं है। यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है कि क्या हिमालय का मौसम धीरे-धीरे अपनी पुरानी लय बदल रहा है? इसका अंतिम जवाब वैज्ञानिक आंकड़े ही देंगे। लेकिन अगर बर्फबारी, तापमान और वर्षा के पैटर्न में लगातार बदलाव जारी रहता है, तो इसका असर केवल ओम पर्वत की खूबसूरती तक सीमित नहीं रहेगा। पानी, खेती, स्थानीय जीवन, पर्यटन और पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। ओम पर्वत की काली पड़ती चोटी इसलिए एक तस्वीर से कहीं ज्यादा है—यह हिमालय को समझने, बचाने और उसके बदलते मौसम को गंभीरता से दर्ज करने का समय है। Post Views: 4 Post navigation सुबह से रात तक स्वस्थ रहने का आसान डेली रूटीन: उठने के बाद क्या करें, क्या खाएं और कब आराम करें TempraX Thermosteel Bottle: पानी को सिर्फ स्टोर नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की लाइफस्टाइल को स्मार्ट बनाने वाली बोतल