अल नीनो बढ़ाएगा किसानों की मुश्किलें Writer by Mohit Kumar 22-8-2026 4:12 pm नई दिल्ली: प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहा अल नीनो (El Niño) भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम और कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। ब्रिटेन के Met Office के ताजा पूर्वानुमानों के मुताबिक मौजूदा अल नीनो घटना असाधारण रूप से मजबूत हो सकती है और एक सदी से अधिक समय में सबसे शक्तिशाली घटनाओं में शामिल होने की संभावना है। इसका असर वैश्विक तापमान पर भी पड़ सकता है और 2027 के रिकॉर्ड स्तर पर सबसे गर्म वर्ष बनने का खतरा जताया गया है। भारत के लिए चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर निर्भर करता है। कमजोर या असमान मानसून का सीधा असर खेतों में बुवाई, फसल की वृद्धि, सिंचाई, उत्पादन और अंततः खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। 2026 का मानसून पहले ही कमजोर भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अपने दूसरे चरण के पूर्वानुमान में पूरे देश में मौसमी बारिश को दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। IMD के अनुसार उस समय 84 प्रतिशत संभावना नीचे-सामान्य या सामान्य से कम बारिश की श्रेणी में थी। बाद की सरकारी जानकारी के अनुसार 2 अगस्त 2026 तक देश में संचयी मानसूनी बारिश LPA से लगभग 12 प्रतिशत कम थी। हालांकि जुलाई में मध्य भारत में अच्छी बारिश के कारण देशव्यापी स्थिति में सुधार हुआ, लेकिन बारिश का वितरण कई इलाकों में असमान बना रहा। यही असमानता किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता है। किसी इलाके में कुछ दिनों में अत्यधिक बारिश और उसके बाद लंबा सूखा अंतराल फसल के लिए लगातार बारिश से भी ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है। क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका प्रभाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में मजबूत अल नीनो अक्सर कमजोर या अनियमित मानसून के जोखिम को बढ़ाता है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर अल नीनो वर्ष में भारत में सूखा ही पड़े। भारतीय मानसून पर हिंद महासागर की स्थिति, IOD, स्थानीय मौसम प्रणालियां और अन्य जलवायु कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस बार चिंता इसलिए बढ़ी है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय पूर्वानुमानों में विकसित हो रहे अल नीनो के बेहद मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार 2026 में विकसित हो रहा अल नीनो रिकॉर्ड स्तर की मजबूत घटनाओं में शामिल हो सकता है, जबकि Met Office ने 2027 के बेहद गर्म वर्ष बनने की आशंका जताई है। खरीफ फसलों पर सबसे बड़ा खतरा कम बारिश का सबसे सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें और कई अन्य फसलें मानसूनी बारिश पर काफी निर्भर हैं। यदि फसल के महत्वपूर्ण विकास चरण में पर्याप्त पानी नहीं मिलता है तो: धान की रोपाई और पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। मक्का की उत्पादकता में कमी आ सकती है। सोयाबीन और दालों में नमी की कमी से उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कपास में पौधे की वृद्धि और बॉल बनने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों का जोखिम सिंचित क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा बढ़ सकता है। हालांकि किसी एक फसल में 10 प्रतिशत से अधिक उत्पादन गिरावट को अभी देशव्यापी निश्चित आंकड़े के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए। वास्तविक नुकसान बारिश की मात्रा, उसके वितरण, बुवाई के समय, मिट्टी की नमी और सिंचाई की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। 315 जिलों पर सरकार की खास नजर अल नीनो के खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले ही व्यापक तैयारी शुरू कर दी है। कृषि मंत्रालय के अनुसार देश के 315 जिलों को कम या असमान बारिश के जोखिम के मद्देनजर प्राथमिकता के आधार पर देखा जा रहा है। इनमें 111 उच्च-प्राथमिकता वाले जिले ऐसे हैं जहां सिंचाई कवरेज 25 प्रतिशत से कम है। सरकार ने जिला स्तर पर कृषि आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं, जिनमें कम बारिश की स्थिति में वैकल्पिक फसलों, कम अवधि वाली किस्मों, फसल विविधीकरण और उपलब्ध पानी के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। धान से लेकर दाल तक बदल सकती है रणनीति अगर किसी इलाके में मानसून कमजोर रहता है तो किसानों को पानी की ज्यादा जरूरत वाली फसलों की जगह कम अवधि और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर जाने की सलाह दी जा सकती है। सरकार की तैयारियों में दालों, मोटे अनाज और तिलहनों जैसी अपेक्षाकृत कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना भी शामिल है। स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से फसल बदलने और उपलब्ध नमी का अधिकतम उपयोग करने की रणनीति तैयार की गई है। ICAR के कृषि अनुसंधान संस्थानों ने भी अलग-अलग राज्यों के लिए जिला-स्तरीय आकस्मिक योजनाएं और किसानों के लिए अल नीनो संबंधी सलाह जारी की है। इनमें महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड समेत कई राज्यों के लिए अलग-अलग योजनाएं शामिल हैं। खाद्य महंगाई का भी बढ़ सकता है खतरा कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है तो उसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहता। सब्जियों, दालों, अनाज, खाद्य तेल और चीनी जैसी वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। कम उत्पादन और बढ़ती मांग के बीच बाजार में कीमतें ऊपर जा सकती हैं। इससे ग्रामीण परिवारों की आय और खर्च दोनों प्रभावित हो सकते हैं। वहीं सरकार को कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए बफर स्टॉक, आयात-निर्यात नीति और बाजार हस्तक्षेप जैसे उपायों का सहारा लेना पड़ सकता है। हालांकि महंगाई कितनी बढ़ेगी, यह अभी निश्चित नहीं कहा जा सकता क्योंकि खाद्य कीमतों पर वैश्विक बाजार, सरकारी स्टॉक, आयात, घरेलू उत्पादन और अन्य मौसम संबंधी परिस्थितियों का भी प्रभाव पड़ता है। किसानों के लिए सरकार की तैयारी केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने किसानों को संभावित मौसम जोखिम से बचाने के लिए कई स्तरों पर तैयारी की है। इनमें शामिल हैं: 1. वैकल्पिक फसल योजना: कम बारिश की स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों में वैकल्पिक फसलों का इस्तेमाल। 2. कम अवधि वाली किस्में: ऐसी फसलों और किस्मों को प्राथमिकता देना जो कम समय और कम पानी में तैयार हो सकें। 3. जल संरक्षण: तालाब, खेत-तालाब, चेक डैम और अन्य जल संरचनाओं के जरिए बारिश के पानी को रोकने पर जोर। 4. बीज की उपलब्धता: आपात स्थिति में किसानों को वैकल्पिक फसलों के लिए पर्याप्त बीज उपलब्ध कराने की तैयारी। 5. फसल विविधीकरण: किसी एक फसल पर निर्भरता कम करने के लिए अलग-अलग फसलों को अपनाने पर जोर। 6. किसानों को समय पर सलाह: मौसम की स्थिति के अनुसार किसानों को कृषि वैज्ञानिकों और विभागों के माध्यम से सलाह देने की व्यवस्था। सरकार ने सभी जिलों के लिए कृषि आकस्मिक योजनाएं तैयार करने और उन्हें जरूरत पड़ने पर जमीन पर लागू करने पर जोर दिया है। शिवराज सिंह चौहान बोले- घबराने की जरूरत नहीं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संभावित अल नीनो प्रभाव को लेकर किसानों से घबराने के बजाय तैयारी पर जोर दिया है। सरकार का कहना है कि संभावित मौसम जोखिम को देखते हुए पहले से योजनाएं बनाई जा रही हैं, ताकि किसानों को जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक फसल, बीज, पानी और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जा सके। हालिया सरकारी तैयारियों से यह संकेत मिलता है कि केंद्र इस संकट को केवल बारिश की समस्या के रूप में नहीं बल्कि कृषि, जल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौती के रूप में देख रहा है। क्या 2027 होगा इतिहास का सबसे गर्म साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि मजबूत अल नीनो और पहले से बढ़ रहे वैश्विक तापमान का मेल 2027 को नया तापमान रिकॉर्ड बनाने की ओर ले जा सकता है। Met Office के ताजा अनुमान में 2027 के रिकॉर्ड गर्म वर्ष बनने की संभावना जताई गई है। हालांकि किसी वर्ष का वास्तविक तापमान रिकॉर्ड कई महीनों के मौसम और समुद्री परिस्थितियों पर निर्भर करता है, इसलिए इसे अभी पूर्वानुमान के रूप में ही देखा जाना चाहिए, अंतिम परिणाम के रूप में नहीं। भारत के सामने दोहरी चुनौती भारत के सामने चुनौती सिर्फ कम बारिश की नहीं है। एक तरफ कमजोर मानसून कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है, तो दूसरी तरफ अल नीनो से जुड़े वैश्विक तापमान में इजाफे से गर्मी और पानी की मांग बढ़ सकती है। ऐसे में आने वाले महीनों में जल प्रबंधन, फसल चयन, सिंचाई दक्षता और मौसम आधारित कृषि सलाह बेहद महत्वपूर्ण हो जाएंगे। कमजोर मानसून के बीच अल नीनो का वार अल नीनो का मजबूत होना भारतीय कृषि के लिए निश्चित रूप से जोखिम बढ़ाता है, लेकिन इसे सीधे-सीधे देशव्यापी कृषि संकट या खाद्य संकट का निश्चित संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी। भारत ने इस बार संभावित खतरे को देखते हुए पहले से जिला-स्तरीय योजनाएं तैयार की हैं। अब असली चुनौती इन योजनाओं को कागज से खेत तक पहुंचाने की है। यदि कमजोर बारिश वाले क्षेत्रों में समय रहते वैकल्पिक फसल, सिंचाई, बीज और जल संरक्षण की व्यवस्था लागू की जाती है तो संभावित नुकसान को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है। आने वाले सप्ताह इसलिए भारतीय कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे—क्योंकि मानसून की स्थिति, अल नीनो की तीव्रता और खेतों में उपलब्ध नमी ही तय करेगी कि यह मौसम सामान्य चुनौती बनकर गुजरता है या किसानों के लिए बड़ी परीक्षा साबित होता है। Post Views: 1 Post navigation क्वींसलैंड टेस्ट में स्टार्क का कहर: 22 गेंदों में 5 विकेट, डेल स्टेन को पीछे छोड़ा; बांग्लादेश 64 रन पर ढेर