नई दिल्ली। दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही बड़े डेटा सेंटरों की जरूरत भी लगातार बढ़ती जा रही है। डेटा सेंटर के लिए जमीन, बिजली और पानी की भारी जरूरत एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे समय में समुद्र के ऊपर तैरने वाला डेटा सेंटर भविष्य की तकनीक के रूप में सामने आ रहा है। Writer by Mohit Kumar 26-8-2026 11:52:am दक्षिण कोरिया की Samsung Heavy Industries ने 50 मेगावाट क्षमता वाले फ्लोटिंग डेटा सेंटर के डिजाइन को मंजूरी मिलने की जानकारी दी है। इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि डेटा सेंटर को जमीन पर बनाने के बजाय समुद्र में तैरते प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया जा सकता है। समुद्र के पानी से होगी कूलिंग डेटा सेंटर में हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं, जिससे काफी गर्मी पैदा होती है। पारंपरिक डेटा सेंटरों में सर्वरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा और पानी की आवश्यकता होती है। फ्लोटिंग डेटा सेंटर में समुद्री पानी का इस्तेमाल एक सील्ड-लूप कूलिंग सिस्टम के जरिए किया जा सकता है। इस व्यवस्था में पीने योग्य पानी की जरूरत नहीं होगी। इससे मीठे पानी के संसाधनों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। बताया गया है कि इस तरह की समुद्री कूलिंग व्यवस्था पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में कूलिंग से जुड़ी ऊर्जा खपत में करीब 40 से 60 प्रतिशत तक कमी ला सकती है। एक से दो साल में तैयार हो सकता है डेटा सेंटर पारंपरिक डेटा सेंटर बनाने में जमीन की उपलब्धता, बिजली कनेक्शन, पानी की व्यवस्था और निर्माण संबंधी मंजूरियों के कारण काफी समय लग सकता है। बड़े डेटा सेंटरों के लिए उपयुक्त जमीन ढूंढना भी आसान नहीं है। फ्लोटिंग मॉडल में जहाज निर्माण उद्योग की तकनीक और शिपयार्ड की निर्माण प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मॉड्यूलर तरीके से डेटा सेंटर तैयार करने और उसे समुद्र में तैनात करने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इस मॉडल के तहत निर्माण अवधि करीब एक से दो वर्ष तक होने की संभावना बताई गई है। AI की बढ़ती मांग के बीच क्यों अहम है यह तकनीक AI मॉडल, क्लाउड सेवाओं और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के कारण दुनिया भर में डेटा प्रोसेसिंग की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। इसके लिए अधिक क्षमता वाले डेटा सेंटरों की जरूरत पड़ रही है। लेकिन बड़े डेटा सेंटरों को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली और कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। ऐसे में समुद्र आधारित डेटा सेंटर जमीन और मीठे पानी की उपलब्धता से जुड़ी कुछ चुनौतियों को कम करने का विकल्प दे सकते हैं। इसके अलावा, यदि भविष्य में ऐसे केंद्रों को समुद्र के नजदीक उपलब्ध अक्षय ऊर्जा स्रोतों के साथ जोड़ा जाता है, तो डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में भी संभावनाएं बढ़ सकती हैं। क्या समुद्र पर ही होगा भविष्य का क्लाउड फ्लोटिंग डेटा सेंटर अभी पारंपरिक डेटा सेंटरों का सीधा विकल्प नहीं हैं। समुद्री मौसम, रखरखाव, नेटवर्क कनेक्टिविटी, सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव जैसी कई चुनौतियों का समाधान करना होगा। फिर भी यह तकनीक एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है। आने वाले समय में डेटा सेंटर केवल जमीन पर बने बड़े भवनों तक सीमित नहीं रह सकते, बल्कि समुद्र में तैरते मॉड्यूलर प्लेटफॉर्म भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बन सकते हैं। AI और क्लाउड कंप्यूटिंग की बढ़ती मांग के बीच फ्लोटिंग डेटा सेंटर एक ऐसी अवधारणा है, जो जमीन और मीठे पानी की सीमाओं को कम करने की कोशिश करती है। अगर इसकी तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान निकलता है, तो भविष्य में समुद्र के ऊपर बने डेटा सेंटर डिजिटल दुनिया की तस्वीर बदल सकते हैं। Post Views: 3 Post navigation काशीपुर में दर्दनाक हादसा: ड्यूटी के दौरान ट्रेन की चपेट में आने से गेटमैन की मौत, मौके पर मचा हड़कंप दिल्ली में बारिश ने तोड़ा दो साल का रिकॉर्ड, कई इलाकों में 100 मिमी से ज्यादा वर्षा; मानसून का कोटा पूरा