अपनी काबिलियत से चमके ध्रुव जुरेल; कोलंबो टेस्ट में दिखाया दम writer by Mohit Kumar 25-8-2026 2:43 pm कोलंबो टेस्ट में ध्रुव जुरेल की बल्लेबाजी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह सिर्फ ऋषभ पंत के बैकअप विकेटकीपर नहीं हैं। शांत स्वभाव, मजबूत तकनीक और मुश्किल परिस्थितियों में लंबी पारी खेलने की क्षमता ने जुरेल को भारतीय टेस्ट टीम के लिए बेहद महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना दिया है। कोलंबो टेस्ट में भारतीय टीम की बल्लेबाजी की चर्चा जब भी होगी, ऋषभ पंत की जुझारू पारी का जिक्र जरूर आएगा। हाथ पर चोट लगने के बावजूद पंत मैदान पर लौटे और श्रीलंकाई गेंदबाजों के खिलाफ उसी आक्रामक अंदाज में बल्लेबाजी की, जिसके लिए वह जाने जाते हैं। लेकिन इसी पारी के दूसरे छोर पर एक ऐसा बल्लेबाज खड़ा था, जिसने बिना शोर किए अपनी बल्लेबाजी से मैच पर गहरी छाप छोड़ी—ध्रुव जुरेल। जुरेल की बल्लेबाजी में पंत जैसी चमक-दमक नहीं है। वह हर गेंद को बाउंड्री के लिए भेजने की कोशिश नहीं करते और न ही उनकी बल्लेबाजी में अनावश्यक जोखिम नजर आता है। लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है। वह परिस्थितियों को पढ़ते हैं, गेंदबाजों को समझते हैं और फिर उसी हिसाब से अपनी पारी को आगे बढ़ाते हैं। पंत के साथ जुरेल की जोड़ी बनी श्रीलंका के लिए बड़ी चुनौती कोलंबो में श्रीलंका के सामने मुश्किल यह थी कि एक छोर पर ऋषभ पंत लगातार आक्रामक क्रिकेट खेल रहे थे, जबकि दूसरे छोर पर ध्रुव जुरेल बेहद संयम के साथ रन जोड़ रहे थे। पंत की बल्लेबाजी ने श्रीलंकाई गेंदबाजों का ध्यान अपनी ओर खींचा। फील्ड बदली गई, गेंदबाजी की लाइन बदली गई और लगातार शॉर्ट गेंदों का इस्तेमाल किया गया। पंत ने इन चुनौतियों का जवाब अपने अंदाज में दिया। इसी दौरान जुरेल ने दूसरी तरफ से भारतीय पारी को मजबूती दी। उन्होंने गेंद को उसकी योग्यता के अनुसार खेला और खराब गेंदों का इंतजार किया। नतीजा यह रहा कि श्रीलंका को समझ ही नहीं आया कि किस बल्लेबाज पर ज्यादा दबाव बनाया जाए। यही जुरेल की बल्लेबाजी की खासियत है—उनकी पारी अक्सर शुरू में शांत दिखाई देती है, लेकिन कुछ समय बाद गेंदबाजों को पता चलता है कि यह बल्लेबाज काफी आगे निकल चुका है। जुरेल की सबसे बड़ी ताकत है उनकी तकनीक पूर्व भारतीय बल्लेबाजी कोच विक्रम राठौर भी जुरेल की तकनीक के बड़े प्रशंसक रहे हैं। राठौर के मुताबिक जुरेल ने अपनी तकनीक पर काफी मेहनत की है और आज के दौर में इतनी मजबूत तकनीक वाले बल्लेबाज कम देखने को मिलते हैं। जुरेल की बल्लेबाजी को देखकर सबसे खास बात यह नजर आती है कि उनके पास शॉट खेलने की क्षमता होने के बावजूद वह हर गेंद पर शॉट खेलने की कोशिश नहीं करते। वह गेंद को देर से खेलते हैं, शरीर के करीब रखते हैं और जरूरत पड़ने पर डिफेंस करने में भी संकोच नहीं करते। टेस्ट क्रिकेट में यही गुण किसी बल्लेबाज को लंबी पारी खेलने की क्षमता देता है। 91 प्रतिशत से ज्यादा कंट्रोल—जुरेल की बल्लेबाजी की असली कहानी कोलंबो टेस्ट में जुरेल की बल्लेबाजी के आंकड़े भी उनकी तकनीक की कहानी बताते हैं। उन्होंने 100 से ज्यादा गेंदों का सामना किया और उनका कंट्रोल प्रतिशत करीब 91.6 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि टेस्ट क्रिकेट में केवल रन बनाना ही पर्याप्त नहीं होता। असली चुनौती लंबे समय तक विकेट पर टिके रहना और गेंदबाजों को अपनी गलती करने के लिए मजबूर करना होती है। जुरेल ने यही किया। उन्होंने श्रीलंकाई स्पिनरों के खिलाफ बेहद धैर्य दिखाया। अच्छी लेंथ की गेंदों को मजबूती से डिफेंड किया और खराब गेंदों को रन में बदला। जैसे-जैसे पिच पर गेंद ज्यादा घूमने लगी, जुरेल की तकनीक और भी महत्वपूर्ण साबित हुई। स्पिन के खिलाफ भी नहीं घबराते जुरेल श्रीलंका के स्पिनरों ने जुरेल को लगातार चुनौती देने की कोशिश की। पिच से टर्न बढ़ रहा था और बल्लेबाजों के लिए शॉट खेलना आसान नहीं था। इसके बावजूद जुरेल ने स्पिन के खिलाफ अपना संतुलन नहीं खोया। उन्होंने आगे निकलकर खेलने के बजाय गेंद की लंबाई को समझकर कभी आगे तो कभी पीछे जाकर उसका सामना किया। उन्होंने स्पिन के खिलाफ करीब 101 गेंदें खेलीं और इन गेंदों से 56 रन बनाए। खास बात यह रही कि उनकी बल्लेबाजी में अनावश्यक जोखिम बहुत कम दिखाई दिया। यही कारण है कि मुश्किल विदेशी परिस्थितियों में भी जुरेल भारतीय टीम के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। नंबर-6 पर बल्लेबाजी करके टीम को देते हैं अतिरिक्त मजबूती भारत के लिए जुरेल की सबसे बड़ी उपयोगिता उनकी बल्लेबाजी क्रम में है। नंबर-6 पर उनके होने का मतलब है कि भारतीय टीम के पास ऊपरी क्रम के बाद भी एक ऐसा बल्लेबाज मौजूद है जो लंबी पारी खेल सकता है। घरेलू परिस्थितियों में यह भारत को विशाल स्कोर बनाने में मदद कर सकता है। वहीं विदेशी परिस्थितियों में जब शीर्ष क्रम जल्दी आउट हो जाए, तब जुरेल पारी को संभालकर टीम को संकट से बाहर निकाल सकते हैं। यानी जुरेल सिर्फ विकेटकीपिंग का विकल्प नहीं हैं। वह अब स्पेशलिस्ट टेस्ट बल्लेबाज की भूमिका भी निभाने की क्षमता दिखा रहे हैं। जुरेल ने मौके मिलने का इंतजार नहीं किया, बल्कि मौके खुद बनाए भारतीय टीम में जगह बनाना आसान नहीं है। खासकर तब जब आपके सामने ऋषभ पंत जैसा मैच विनर विकेटकीपर-बल्लेबाज हो। लेकिन जुरेल ने कभी खुद को केवल बैकअप के तौर पर सीमित नहीं रखा। उन्होंने भारत ए के दौरों और घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बनाए। ऑस्ट्रेलिया में रन बनाए, इंग्लैंड में उपयोगी पारियां खेलीं और मुश्किल परिस्थितियों में खुद को साबित किया। 2024 में रांची टेस्ट में उनका 90 रन का प्रदर्शन भारतीय क्रिकेट में उनकी पहचान मजबूत करने वाला पल था। उस पिच पर गेंद नीची रह रही थी और बल्लेबाजी आसान नहीं थी। लेकिन जुरेल ने धैर्य दिखाया और अपनी तकनीक का शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद विदेशी दौरों पर भी उनके प्रदर्शन ने चयनकर्ताओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि जुरेल को केवल पंत के विकल्प के तौर पर देखना शायद उनके साथ नाइंसाफी होगी। पंत और जुरेल—अब यह ‘या तो’ नहीं, ‘दोनों’ का विकल्प है भारतीय क्रिकेट के लिए सबसे दिलचस्प बदलाव यही है। पहले सवाल होता था—पंत खेलेंगे या जुरेल अब स्थिति बदलती हुई नजर आ रही है। भारत के पास ऐसी टीम बनाने का विकल्प है जिसमें पंत और जुरेल दोनों खेल सकते हैं। पंत अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से मैच का रुख बदल सकते हैं और जुरेल अपनी स्थिरता से पारी को आधार दे सकते हैं। यह संयोजन टेस्ट क्रिकेट में बेहद खतरनाक हो सकता है। एक बल्लेबाज गेंदबाजों पर हमला करता है, दूसरा उन्हें थकाता है। एक तेजी से रन बढ़ाता है, दूसरा विकेट बचाकर पारी को लंबा करता है। जुरेल की सबसे बड़ी खासियत—वह लगातार खुद को बेहतर बनाना चाहते हैं जुरेल की कहानी सिर्फ प्रतिभा की नहीं, बल्कि मेहनत की भी है। विक्रम राठौर के मुताबिक जुरेल नेट्स में भी अपनी बल्लेबाजी को लेकर लगातार सवाल करते हैं। अच्छा खेलने के बाद भी वह यह सोचते हैं कि कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई। यही मानसिकता किसी खिलाड़ी को लंबे समय तक बेहतर बनाती है। कई युवा बल्लेबाज अच्छी पारी खेलने के बाद संतुष्ट हो जाते हैं। जुरेल इसके उलट अपनी बल्लेबाजी की कमियों को खोजने की कोशिश करते हैं। यही कारण है कि उनके खेल में लगातार सुधार दिखाई दे रहा है। श्रीलंका के खिलाफ लगातार प्रदर्शन ने बढ़ाया भरोसा गाले में जुरेल ने अर्धशतक लगाकर टीम को महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इसके बाद कोलंबो में भी उन्होंने अपनी बल्लेबाजी की गुणवत्ता दिखाई। यह महज दो अच्छी पारियों का मामला नहीं है। जुरेल अब लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि वह अलग-अलग परिस्थितियों में बल्लेबाजी कर सकते हैं। तेज गेंदबाज हों या स्पिनर, अच्छी पिच हो या चुनौतीपूर्ण सतह—जुरेल के पास हर परिस्थिति के लिए अलग तरीका मौजूद है। भारतीय टेस्ट टीम के संक्रमण काल में जुरेल बेहद महत्वपूर्ण भारतीय टेस्ट क्रिकेट इस समय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। कई अनुभवी खिलाड़ियों के बाद नई पीढ़ी को जिम्मेदारी मिल रही है। ऐसे समय में टीम को ऐसे बल्लेबाजों की जरूरत होती है जो सिर्फ प्रतिभाशाली न हों, बल्कि दबाव में भी भरोसेमंद साबित हों। ध्रुव जुरेल इस भूमिका के लिए बिल्कुल फिट दिखाई देते हैं। उनकी उम्र अभी कम है और उनके खेल में सुधार की काफी गुंजाइश है। अगर वह इसी तरह लगातार प्रदर्शन करते रहे तो आने वाले वर्षों में भारतीय टेस्ट टीम के मध्यक्रम का अहम हिस्सा बन सकते हैं। निष्कर्ष: जुरेल अब बैकअप नहीं, टीम की जरूरत हैं ध्रुव जुरेल की कहानी बेहद दिलचस्प है। वह भारतीय टीम में दूसरे विकेटकीपर के रूप में आए थे, लेकिन अपनी बल्लेबाजी के दम पर उन्होंने अपनी भूमिका को बदल दिया। अब वह सिर्फ इसलिए टीम में नहीं हैं कि ऋषभ पंत के साथ कुछ हो जाए तो विकेटकीपिंग संभाल सकें। वह इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनकी बल्लेबाजी भारतीय टेस्ट टीम को अतिरिक्त मजबूती देती है। पंत जहां तूफान की तरह मैच बदल सकते हैं, वहीं जुरेल धीरे-धीरे मैच को अपने नियंत्रण में ले जाने वाले बल्लेबाज हैं। और शायद यही वजह है कि जिस खिलाड़ी को कभी भारतीय टीम के लिए ‘लक्जरी’ माना जा सकता था, वह अब धीरे-धीरे टीम इंडिया की टेस्ट जरूरत बनता जा रहा है। अगर जुरेल अपनी तकनीक, मेहनत और संयम को इसी तरह बरकरार रखते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारतीय टेस्ट क्रिकेट की कहानी में उनका नाम केवल एक विकेटकीपर के तौर पर नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद और मैच जिताऊ बल्लेबाज के रूप में लिखा जा सकता है। Post Views: 1 Post navigation धतूरा बेचने पर Amazon, Swiggy Instamart और BigBasket पर गिरी 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