हिमालय की ऊंची चोटियों पर तेजी से बदलता मौसम और पिघलते ग्लेशियर आने वाले समय में बड़े प्राकृतिक खतरों की वजह बन सकते हैं। सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में करीब 7,500 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से कई झीलें प्राकृतिक बर्फ और मलबे से बने बांधों के पीछे स्थित हैं। ऐसे बांध टूटने की स्थिति में अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर बह सकता है। Writer by Mohit Kumar 29-8-2026 4: 47 pm सिक्किम में 25 झीलें बेहद संवेदनशील इन ग्लेशियल झीलों का एक बड़ा हिस्सा संवेदनशील हिमालयी राज्यों में मौजूद है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, करीब 10 प्रतिशत झीलें सिक्किम में हैं और वहां लगभग 25 झीलों को बेहद खतरनाक श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों की निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तापमान बढ़ने, ग्लेशियरों के पिघलने या भूस्खलन जैसी घटनाओं से इनके जलस्तर और प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ सकता है। गंगा बेसिन में 4,700 ग्लेशियल झीलें एक अध्ययन के अनुसार, करीब 4,700 ग्लेशियल झीलें गंगा नदी बेसिन में आती हैं। इनका कैचमेंट एरिया 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक बताया गया है। इसका मतलब है कि हिमालयी क्षेत्र में किसी बड़ी झील का प्राकृतिक बांध टूटने पर उसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि पानी और मलबे की तेज धारा निचले और मैदानी इलाकों तक पहुंच सकती है। कैसे आती है अचानक बाढ़? ग्लेशियल झील से अचानक आने वाली बाढ़ को Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है। ऐसी घटनाओं में कई प्राकृतिक प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं। बर्फ या चट्टान का गिरना → भारी मलबा झील में पहुंचना → पानी का स्तर अचानक बढ़ना → प्राकृतिक बांध पर दबाव बढ़ना → बांध टूटना → पानी और मलबे की तेज धारा नीचे की ओर बहना। यही वजह है कि हिमालयी आपदाएं कई बार एक चेन रिएक्शन की तरह विकसित होती हैं। नेपाल की घटना ने बढ़ाई चिंता राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य कृष्णा वत्सा के अनुसार, नेपाल में हुई घटना हिमालयी आपदाओं के एक नए और जटिल पहलू की ओर संकेत करती है। हालांकि किसी विशेष घटना के वैज्ञानिक कारणों की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन हिमालय में ग्लेशियर, झील, भूस्खलन और तेज बहाव आपस में जुड़े हुए जोखिम पैदा कर सकते हैं। खतरा सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं सबसे बड़ी चिंता यह है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में शुरू हुई एक छोटी प्राकृतिक घटना कुछ ही समय में बड़े इलाके को प्रभावित कर सकती है। पहाड़ों में तेज बहाव अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और अन्य मलबा लेकर नीचे आता है, जिससे पुल, सड़कें, घर और नदी किनारे की बस्तियां प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए हिमालयी ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी, जोखिम वाली झीलों की पहचान, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संवेदनशील इलाकों में समय रहते निकासी योजना बेहद जरूरी मानी जा रही है। Post Views: 4 Post navigation महाराष्ट्र में ‘मुंढे इफेक्ट’: गुलाबी कॉटन कैंडी गायब, बाजार में लौटी सफेद ‘बुढ़िया के बाल’ VIDEO: 41 की उम्र में भी रोनाल्डो का जलवा बरकरार, 978वां गोल दागकर मचाया तहलका, अल नासर को दिलाई शानदार जीत