रूस की सोने पर बड़ी बिकवाली! 44 टन गोल्ड निकाला बाजार में, अब क्या सस्ता होगा सोना

Writer by Mohit Kumar 

25-8-2026 10:52 pm

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। दुनिया के कई देश जहां अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए लगातार सोना खरीद रहे हैं, वहीं रूस के गोल्ड रिजर्व में बड़ी गिरावट ने वैश्विक बाजार का ध्यान खींचा है। रूस ने 2026 की पहली छमाही में करीब 44 टन सोना बेचा, जिसके बाद उसके आधिकारिक गोल्ड रिजर्व में उल्लेखनीय कमी आई है। इस घटनाक्रम ने निवेशकों के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या रूस की भारी बिकवाली का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों पर भी पड़ेगा।

रूस ने क्यों बेचा इतना सोना

रूस के लिए सोना केवल निवेश का साधन नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उसकी वित्तीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंक के पास मौजूद सोना जरूरत पड़ने पर वित्तीय संसाधन जुटाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

रूस की अर्थव्यवस्था पर युद्ध से जुड़े खर्च का दबाव भी बना हुआ है। ऐसे में सरकार और केंद्रीय बैंक को बजट तथा वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए रिजर्व के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

गोल्ड रिजर्व 6 साल के निचले स्तर पर

रिपोर्टों के मुताबिक, रूस के आधिकारिक गोल्ड रिजर्व में गिरावट 2020 के बाद के सबसे निचले स्तर तक पहुंच गई है। हालांकि रूस अभी भी दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण भंडार रखने वाले देशों में शामिल है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि 44 टन की बिक्री रूस के कुल गोल्ड रिजर्व की तुलना में अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है। इसलिए केवल इस बिक्री को देखकर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि रूस अपना पूरा सोना बाजार में उतार रहा है।

क्या दुनिया में कौड़ियों के भाव बिकेगा सोना

रूस की इस बिकवाली से यह सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या अब सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट आएगी। लेकिन बाजार में सोने का भाव सिर्फ किसी एक देश की खरीद या बिक्री से तय नहीं होता।

अंतरराष्ट्रीय गोल्ड प्राइस पर कई कारकों का असर पड़ता है। इनमें अमेरिका की ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती, महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और निवेशकों की सुरक्षित निवेश की मांग प्रमुख हैं।

अगर रूस बड़े पैमाने पर लगातार सोना बेचता है और इसके साथ दूसरे बड़े निवेशक भी बिकवाली शुरू कर देते हैं, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन सिर्फ रूस की 44 टन की बिक्री से सोने के भाव के अचानक ‘कौड़ियों के भाव’ आने की संभावना बताना फिलहाल अतिशयोक्ति होगी।

केंद्रीय बैंक अभी भी सोना खरीद रहे हैं

दूसरी तरफ दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। खासतौर पर पिछले कुछ वर्षों में भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर पर निर्भरता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच सोने को सुरक्षित संपत्ति माना जा रहा है।

यही वजह है कि रूस की बिक्री के बावजूद वैश्विक स्तर पर सोने की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यदि केंद्रीय बैंकों की खरीदारी मजबूत रहती है तो रूस की बिक्री का असर सीमित भी रह सकता है।

भारत में क्या होगा असर

भारत दुनिया के बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट आती है तो इसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है। हालांकि भारत में सोने का घरेलू भाव केवल अंतरराष्ट्रीय कीमत से तय नहीं होता।

डॉलर-रुपया विनिमय दर, आयात शुल्क, स्थानीय प्रीमियम, टैक्स और घरेलू मांग भी कीमत को प्रभावित करते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना सस्ता होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि भारत में भी उसी अनुपात में कीमत गिर जाए।

निवेशकों को क्या समझना चाहिए

रूस की सोने की बिक्री को ग्लोबल गोल्ड मार्केट के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसे सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं माना जा सकता।

अगर रूस की बिक्री आगे भी जारी रहती है और वैश्विक केंद्रीय बैंकों की खरीदारी कमजोर पड़ती है, तो गोल्ड पर दबाव बढ़ सकता है। इसके उलट अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, ब्याज दरों में नरमी आती है या निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की ओर लौटते हैं, तो सोने की मांग फिर मजबूत हो सकती

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रूस का करीब 44 टन सोना बेचना निश्चित रूप से बड़ी खबर है, लेकिन इससे यह कहना जल्दबाजी होगी कि अब दुनिया में सोना कौड़ियों के भाव बिकेगा। रूस की बिक्री से बाजार में अस्थायी दबाव जरूर बन सकता है, लेकिन सोने की आगे की दिशा तय करने में केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, अमेरिकी डॉलर, ब्याज दरें और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

इसलिए निवेशकों के लिए रूस की इस बिकवाली को Gold Price में गिरावट का अकेला संकेत मानने के बजाय पूरे वैश्विक बाजार के संकेतों पर नजर रखना ज्यादा जरूरी होगा।

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