नई दिल्ली। गिद्धों को अक्सर उनकी शारीरिक बनावट और मृत पशुओं को खाने की आदत के कारण उपेक्षा की नजर से देखा जाता है, लेकिन प्रकृति के संतुलन में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि हर साल अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के अवसर पर दुनिया भर में इन पक्षियों के संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। वर्ष 2026 में भारत में इस अवसर का संदेश ‘संकट से सुधार की ओर भारत के गिद्धों का संरक्षण’ रखा गया है, जो गिद्ध संरक्षण के बदलते स्वरूप को दर्शाता है।

Writer by Mohit Kumar

7-9-2026 22:32 pm

क्यों जरूरी हैं गिद्ध?

गिद्ध प्रकृति के मौन सफाईकर्मी और प्रहरी हैं। ये मृत पशुओं के शवों को तेजी से खाकर पर्यावरण को साफ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे शवों के लंबे समय तक पड़े रहने से पैदा होने वाले संक्रमण और बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद मिलती है।

गिद्धों की संख्या में कमी केवल एक पक्षी की आबादी का संकट नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। इसलिए इनके संरक्षण को पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों से जोड़कर देखा जाना जरूरी है।

डाइक्लोफेनाक से पैदा हुआ बड़ा संकट

भारत में गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट के प्रमुख कारणों में पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली दवा डाइक्लोफेनाक को माना गया। इस दवा से उपचारित पशुओं के शव खाने पर गिद्धों की बड़ी संख्या में मौत हुई।

इस संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि पशु चिकित्सा से जुड़ा कोई निर्णय वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसके बाद गिद्ध-सुरक्षित दवाओं और सुरक्षित पशु चिकित्सा व्यवस्था पर जोर बढ़ा।

संरक्षण प्रजनन से उम्मीद

गिद्धों को विलुप्ति के खतरे से बचाने के लिए भारत में संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। संरक्षण प्रजनन केंद्रों में गिद्धों को सुरक्षित वातावरण में प्रजनन कराया जाता है और उनकी संख्या बढ़ाने के बाद उन्हें उपयुक्त प्राकृतिक आवासों में वापस छोड़ने की दिशा में काम किया जाता है।

हालांकि केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। असली सफलता तब मानी जाएगी जब जंगल में छोड़े गए गिद्ध सुरक्षित वातावरण में जीवित रहें, भोजन प्राप्त करें और प्राकृतिक रूप से प्रजनन कर अपनी आबादी बढ़ाएं।

वैज्ञानिक निगरानी बनेगी बड़ी ताकत

गिद्ध संरक्षण के लिए यह जानना जरूरी है कि ये पक्षी कहां रहते हैं, कहां भोजन करते हैं और किन क्षेत्रों में उन्हें खतरा है। नियमित गणना, आबादी की निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन से संरक्षण योजनाओं को वास्तविक आंकड़ों के आधार पर तैयार किया जा सकता है।

भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट सेंसिंग और डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकें गिद्धों की गतिविधियों और आवासों की निगरानी को और प्रभावी बना सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी

गिद्ध किसी देश की सीमाओं में बंधे नहीं रहते। कई प्रजातियां लंबी दूरी तय करती हैं और अलग-अलग देशों के पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी होती हैं। ऐसे में उनका संरक्षण भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग करता है।

दक्षिण एशिया में भारत, नेपाल, पाकिस्तान और अन्य देशों के बीच वैज्ञानिक जानकारी, संरक्षण तकनीक और सुरक्षित पशु चिकित्सा व्यवस्था को लेकर सहयोग महत्वपूर्ण है। अफ्रीका और यूरोप में गिद्धों के संरक्षण के लिए अपनाए जा रहे उपायों से भी सीख ली जा सकती है।

गिद्ध संरक्षण को बनाना होगा जनआंदोलन

गिद्धों को बचाना केवल सरकार या वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। इसमें स्थानीय समुदायों, पशुपालकों, पशु चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी जरूरी है।

इसके लिए गिद्ध-सुरक्षित दवाओं का इस्तेमाल सुनिश्चित करने, प्रतिबंधित दवाओं की बिक्री और उपयोग पर निगरानी रखने, सुरक्षित भोजन क्षेत्रों को विकसित करने तथा मृत पशुओं के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।

इसके अलावा बिजली की लाइनों और दूसरे मानव निर्मित ढांचों से पक्षियों के टकराव का खतरा कम करना, संरक्षण प्रजनन केंद्रों को वैज्ञानिक संसाधन उपलब्ध कराना और जंगल में छोड़े गए गिद्धों की लगातार निगरानी करना भी महत्वपूर्ण कदम हैं।

पंचकूला की राष्ट्रीय कार्यशाला ने दिखाया नया रास्ता

भारत में 2026 के अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस का संदेश ‘संकट से सुधार की ओर भारत के गिद्धों का संरक्षण’ संरक्षण की नई सोच को सामने रखता है। पंचकूला में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों, वैज्ञानिक क्षमता, संरक्षण प्रजनन और समुदाय की भागीदारी पर जोर दिया गया।

यह संकेत है कि अब गिद्ध संरक्षण को केवल संकट से निपटने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे दीर्घकालिक पारिस्थितिक पुनर्बहाली का हिस्सा बनाना होगा।

गिद्ध बचेंगे, तभी प्रकृति का संतुलन बचेगा

अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति में कोई भी जीव बेकार नहीं है। जिस पक्षी को इंसान अक्सर उपेक्षा की नजर से देखता है, वही पर्यावरण की प्राकृतिक सफाई व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

गिद्धों की वास्तविक वापसी तभी मानी जाएगी, जब वे सुरक्षित प्राकृतिक आवासों में पर्याप्त संख्या में दिखाई दें और उनकी आबादी अपने दम पर बढ़ने लगे। इसलिए लक्ष्य केवल ‘गिद्धों को बचाना’ नहीं, बल्कि ऐसा सुरक्षित पर्यावरण तैयार करना होना चाहिए जिसमें ये पक्षी स्वतंत्र रूप से रह और प्रजनन कर सकें।

गिद्धों की उड़ान केवल एक पक्षी की उड़ान नहीं है। यह स्वस्थ पर्यावरण, संतुलित पारिस्थितिकी और प्रकृति के साथ मनुष्य के बेहतर संबंध की उड़ान है। गिद्धों को बचाना वास्तव में अपने पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाना है।

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