उत्तराखंड में हिमनद झीलों से जुड़े संभावित खतरों को लेकर किए जा रहे अध्ययन में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। सरस्वती ताल और केदारताल का हाल ही में विशेषज्ञों की टीम ने अध्ययन किया। इस दौरान सरस्वती ताल की लंबाई करीब 700 मीटर, चौड़ाई 300 मीटर और गहराई लगभग 30 मीटर मापी गई। अध्ययन में झील से पानी की निकासी का मार्ग भी सामने आया है।

Writer by Mohit Kumar 

27-9-2026 18:30 pm

राज्य में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और हिमनद झीलों के बढ़ते खतरे को देखते हुए उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से इन झीलों की स्थिति का अध्ययन कराया जा रहा है। इसका उद्देश्य झीलों की संरचना, जलस्तर, जल निकासी और आसपास के क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव का आकलन करना है।

सरस्वती ताल की स्थिति पर अहम जानकारी

अध्ययन के दौरान विशेषज्ञों ने पाया कि सरस्वती ताल की घाटी तुलनात्मक रूप से अधिक चौड़ी है। झील की लंबाई लगभग 700 मीटर और चौड़ाई 300 मीटर है, जबकि इसकी गहराई करीब 30 मीटर दर्ज की गई है।

टीम को झील से पानी की निकासी का रास्ता भी मिला है। जल निकासी मार्ग की जानकारी हिमनद झील से जुड़े संभावित जोखिमों के आकलन के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

केदारताल का आकार सरस्वती ताल से छोटा

अध्ययन के दौरान केदारताल का भी जायजा लिया गया। विशेषज्ञों के अनुसार इसका आकार सरस्वती ताल की तुलना में करीब आधा है। केदारताल की घाटी भी सरस्वती ताल की अपेक्षा अधिक संकरी पाई गई है।

टीम ने दोनों झीलों के आसपास के क्षेत्रों और संभावित प्रभावित आबादी का भी अध्ययन किया, ताकि भविष्य में किसी आपात स्थिति की स्थिति में जोखिम वाले इलाकों की पहचान की जा सके।

दोनों हिमनद झीलें मोरेन डैम से बनी हैं

सरस्वती ताल और केदारताल दोनों को मोरेन डैम वाली हिमनद झीलें बताया गया है। मोरेन डैम प्राकृतिक बांध होते हैं, जो ग्लेशियर के पीछे हटने के दौरान जमा होने वाले पत्थर, मिट्टी और अन्य मलबे से बनते हैं।

ऐसे प्राकृतिक बांधों की स्थिरता और झील में जमा पानी की मात्रा पर लगातार निगरानी रखना जरूरी माना जाता है, क्योंकि अचानक बांध टूटने या बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकलने की स्थिति में निचले क्षेत्रों में खतरा पैदा हो सकता है।

ग्लेशियरों के पिघलने पर भी नजर

अध्ययन के दौरान दोनों झीलों के आसपास मौजूद ग्लेशियरों की स्थिति का भी जायजा लिया गया। केदारताल के पास केदारबमक ग्लेशियर के पिघलने की स्थिति का अध्ययन किया गया। सरस्वती ताल के आसपास मौजूद ग्लेशियर में भी पिघलने की प्रक्रिया देखी गई।

विशेषज्ञों ने ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव और झीलों की स्थिति के बीच संबंध को समझने के लिए क्षेत्र का निरीक्षण किया। आने वाले समय में इन क्षेत्रों की नियमित निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी

हिमनद झीलों से जुड़े संभावित खतरे को समय रहते पहचानने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। टीम ने दोनों झीलों के आसपास ऐसे संभावित स्थानों को भी देखा है, जहां अर्ली वार्निंग सिस्टम और ऑल-वेदर स्टेशन लगाए जा सकते हैं।

अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए झील के जलस्तर और अन्य महत्वपूर्ण बदलावों की निगरानी की जा सकेगी। किसी संभावित खतरे के संकेत मिलने पर संबंधित एजेंसियों और प्रभावित क्षेत्रों तक समय रहते सूचना पहुंचाने में यह व्यवस्था मददगार हो सकती है।

कई संस्थाएं अध्ययन में शामिल

इस महत्वपूर्ण अध्ययन में कई विशेषज्ञ संस्थाओं और एजेंसियों की भागीदारी रही। इनमें यूएलएमएमसी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH), बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज (BSIP), वाडिया इंस्टीट्यूट और एसडीआरएफ शामिल रहे।

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सहयोग से किए जा रहे इस अध्ययन का मकसद हिमनद झीलों की वर्तमान स्थिति को समझने के साथ-साथ भविष्य में संभावित आपदा के जोखिम को कम करने के लिए वैज्ञानिक निगरानी व्यवस्था विकसित करना है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन

उत्तराखंड में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों की स्थिति लगातार बदल रही है। ऐसे में झीलों की लंबाई, चौड़ाई, गहराई, जल निकासी मार्ग, प्राकृतिक बांध और आसपास की आबादी की जानकारी आपदा प्रबंधन की तैयारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

सरस्वती ताल की 30 मीटर गहराई और 700 मीटर लंबाई सामने आने के बाद यहां वैज्ञानिक निगरानी को और मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है। अर्ली वार्निंग सिस्टम और ऑल-वेदर स्टेशन स्थापित होने के बाद इन संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *