देहरादून: हिमालय की ऊंची चोटियां और बर्फ से ढके पहाड़ ऊपर से भले ही शांत नजर आते हों, लेकिन धरती के भीतर लगातार बड़ी भूगर्भीय हलचल चल रही है। वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने हिमालयी क्षेत्र में भूकंप के खतरे को समझने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। अध्ययन के मुताबिक भारतीय प्लेट हर साल करीब 5 सेंटीमीटर की गति से तिब्बत की ओर बढ़ रही है। इस दौरान प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, जिसके कारण धरती के भीतर लगातार तनाव और ऊर्जा जमा हो रही है। Writer by Mohit Kumar 6-10-2026 5:34 pm हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (NGRI) के वैज्ञानिकों ने गुरुत्वाकर्षण माप, भूकंप संबंधी आंकड़ों और उपग्रह डेटा का अध्ययन कर भारतीय प्लेट की अंदरूनी संरचना को समझने की कोशिश की है। शोध से संकेत मिलता है कि भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट के नीचे धंसते हुए तिब्बत के नीचे लगभग 100 किलोमीटर तक की गहराई में पहुंच रही है। प्लेट के मुड़ने और टूटने से बढ़ रहा तनाव वैज्ञानिकों के अनुसार भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट से टकराव एक सामान्य और स्थिर प्रक्रिया नहीं है। प्लेट कई स्थानों पर मुड़ रही है और कुछ हिस्सों में टूटने जैसी संरचनाएं भी बन रही हैं। इसके कारण धरती के भीतर चट्टानों और फॉल्ट क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। जब लंबे समय तक किसी क्षेत्र में भूगर्भीय तनाव जमा होता है और चट्टानें उस तनाव को सहन नहीं कर पातीं, तो अचानक ऊर्जा निकल सकती है। यही प्रक्रिया बड़े भूकंप का कारण बन सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन का मतलब यह नहीं है कि किसी निश्चित तारीख या समय पर भूकंप आने वाला है। शोध का उद्देश्य हिमालय के नीचे मौजूद फॉल्ट सिस्टम और प्लेटों की संरचना को बेहतर तरीके से समझना है। गंगा के मैदान के नीचे छिपी हैं पुरानी पर्वत संरचनाएं इस शोध की एक महत्वपूर्ण जानकारी गंगा के मैदान के नीचे मौजूद पुरानी भूगर्भीय संरचनाओं से जुड़ी है। वैज्ञानिकों ने ऐसी प्राचीन पर्वत शृंखलाओं और भूगर्भीय संरचनाओं की पहचान की है, जो आज जमीन की सतह पर दिखाई नहीं देतीं। इनमें दिल्ली-हरिद्वार, फैजाबाद और मुंगेर-सहरसा जैसी संरचनाएं शामिल हैं। माना जा रहा है कि ये संरचनाएं हिमालय की दिशा में फैली हुई हैं और धरती के भीतर उत्पन्न होने वाले तनाव को अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावित कर सकती हैं। इसका मतलब है कि भूकंप का खतरा पूरे हिमालयी क्षेत्र में एक जैसा नहीं हो सकता। अलग-अलग जगहों पर जमीन के नीचे मौजूद संरचनाओं और फॉल्ट की स्थिति के आधार पर खतरे का स्वरूप अलग हो सकता है। कहीं 35 तो कहीं 70 किलोमीटर मोटी है भूपर्पटी भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर का असर सिर्फ प्लेटों की गति तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव हिमालय और तिब्बती पठार के नीचे मौजूद भूपर्पटी पर भी दिखाई देता है। अध्ययन के मुताबिक उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में भूपर्पटी की मोटाई लगभग 35 किलोमीटर है, जबकि तिब्बती पठार के नीचे इसकी मोटाई करीब 70 किलोमीटर तक पहुंच सकती है। भूपर्पटी की यह अलग-अलग मोटाई धरती के भीतर होने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वैज्ञानिकों के लिए यह जानकारी यह समझने में मदद करती है कि प्लेटों की टक्कर किस तरह हिमालय के नीचे अलग-अलग संरचनाएं बना रही है। हिमालय में ज्यादातर भूकंप उथली गहराई में आते हैं हिमालयी क्षेत्र की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहां आने वाले अधिकांश भूकंप अपेक्षाकृत कम गहराई पर दर्ज किए जाते हैं। अध्ययन के अनुसार हिमालय में बड़ी संख्या में भूकंप लगभग 10 से 15 किलोमीटर की उथली गहराई में आते हैं। उथली गहराई पर आने वाले भूकंप सतह के ज्यादा करीब होते हैं, इसलिए उनकी ऊर्जा का असर जमीन पर अधिक महसूस किया जा सकता है। यही कारण है कि हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भीय गतिविधियों की लगातार निगरानी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। दिल्ली तक फैली संरचनाओं को समझना क्यों जरूरी? शोध में सामने आई दिल्ली-हरिद्वार जैसी भूगर्भीय संरचनाएं इस अध्ययन को और महत्वपूर्ण बनाती हैं। ये संरचनाएं यह संकेत देती हैं कि हिमालय से जुड़ी भूगर्भीय प्रक्रियाओं का प्रभाव केवल ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। हिमालय के नीचे प्लेटों की गतिविधि और गंगा के मैदान के नीचे मौजूद पुरानी भूगर्भीय संरचनाओं के बीच संबंध को समझना भविष्य में भूकंप के जोखिम का बेहतर आकलन करने में मदद कर सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली या किसी अन्य शहर में तुरंत बड़ा भूकंप आने वाला है। वैज्ञानिक अध्ययन केवल उन भूगर्भीय प्रक्रियाओं और संभावित जोखिम क्षेत्रों को समझने में मदद करता है, जो लंबे समय में भूकंपीय गतिविधि को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिकों ने क्या कहा हैदराबाद स्थित एनजीआरआई के भू-वैज्ञानिक डॉ. रवि कुमार के अनुसार, यह शोध किसी भूकंप की तारीख, समय या स्थान की भविष्यवाणी नहीं करता। इसका मुख्य उद्देश्य हिमालय के नीचे मौजूद फॉल्ट सेगमेंट की आंतरिक संरचना और उनमें जमा हो रहे तनाव को समझना है। यह शोध ‘Geophysics for Advancing Seismology’ में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के अध्ययन हिमालयी क्षेत्र में भूकंप के खतरे को समझने, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने और भविष्य की आपदा प्रबंधन रणनीतियों को बेहतर बनाने में उपयोगी हो सकते हैं। हिमालय के नीचे बढ़ रहा भूकंप का खतरा भारतीय प्लेट का हर साल लगभग 5 सेंटीमीटर की दर से तिब्बत की ओर बढ़ना लाखों वर्षों से चल रही भूगर्भीय प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन इस टकराव के कारण हिमालय के नीचे लगातार तनाव जमा हो रहा है। प्लेट का मुड़ना, टूटना और अलग-अलग भूगर्भीय संरचनाओं के साथ उसका संपर्क इस पूरे क्षेत्र को वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोध भूकंप की भविष्यवाणी नहीं करता, बल्कि यह बताता है कि हिमालय के नीचे भूगर्भीय परिस्थितियां कितनी जटिल हैं। ऐसे में हिमालय और उससे जुड़े मैदानी क्षेत्रों में भूकंपीय निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन और आपदा तैयारी को मजबूत करना बेहद जरूरी है। Post Views: 1 Post navigation क्या AGI आ चुका है? 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