नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली का भारत मंडपम 12 और 13 सितंबर 2026 को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक आयोजन का गवाह बन रहा है। भारत की मेजबानी में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इस सम्मेलन में ब्रिक्स देशों के शीर्ष नेता वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, बहुपक्षीय सहयोग और सतत विकास से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा करेंगे। खास बात यह है कि यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब BRICS की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जिससे इस आयोजन का महत्व और बढ़ गया है।

Writer by Mohit Kumar 

12-9-2026 2:57 pm

भारत मंडपम बना वैश्विक कूटनीति का केंद्र

12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में दुनिया के कई प्रभावशाली नेताओं और प्रतिनिधियों की मौजूदगी रहेगी। भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसी के तहत राजधानी में शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया है।

सम्मेलन के दौरान वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने, बहुपक्षीय संस्थाओं को मजबूत करने तथा विकासशील देशों के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेहतर तरीके से रखने जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श होने की उम्मीद है।

मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग समेत कई बड़े नेता

इस शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शीर्ष प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।

इन नेताओं की मौजूदगी सम्मेलन को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। BRICS के मंच पर भारत, रूस और चीन जैसे प्रमुख देशों के बीच होने वाली बातचीत पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर रहेगी।

इसके अलावा अबू धाबी के युवराज, मलेशिया और इथियोपिया के प्रधानमंत्री तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुखों के भी सम्मेलन में शामिल होने की जानकारी सामने आई है। संयुक्त राष्ट्र समेत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भागीदारी से वैश्विक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का दायरा और व्यापक होने की संभावना है।

वैश्विक शासन और बहुपक्षीयता पर होगा मंथन

BRICS शिखर सम्मेलन का प्रमुख फोकस वैश्विक सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करना रहेगा। दुनिया इस समय आर्थिक अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और विकास से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना कर रही है।

ऐसे में BRICS देशों के बीच सहयोग बढ़ाने और विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को वैश्विक मंच पर मजबूती से रखने पर चर्चा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सतत विकास भी सम्मेलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल है। विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा संक्रमण और भविष्य की आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों पर विचार किया जा सकता है।

द्विपक्षीय बैठकों पर भी रहेगी नजर

शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी महत्वपूर्ण रहेंगी। इन मुलाकातों में भारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़े कई मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है।

इनमें रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश और आर्थिक साझेदारी जैसे विषय प्रमुख हो सकते हैं। अलग-अलग देशों के साथ भारत के संबंधों को नई दिशा देने और मौजूदा सहयोग को और मजबूत करने के लिए ये बैठकें अहम मानी जा रही हैं।

BRICS के 20 साल पूरे होने पर विशेष महत्व

इस बार का सम्मेलन इसलिए भी खास है क्योंकि BRICS की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। पिछले दो दशकों में यह समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरा है।

भारत की अध्यक्षता में आयोजित यह शिखर सम्मेलन आने वाले वर्षों में BRICS की भूमिका और प्राथमिकताओं को लेकर भी महत्वपूर्ण संदेश दे सकता है। खासकर विकासशील देशों के बीच आर्थिक सहयोग, व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर समूह की आगे की दिशा तय करने की कोशिश की जा सकती है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सम्मेलन?

भारत के लिए BRICS शिखर सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं, बल्कि अपनी कूटनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं को वैश्विक मंच पर रखने का महत्वपूर्ण अवसर भी है। भारत लंबे समय से बहुपक्षीय सहयोग, विकासशील देशों की आवाज और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर देता रहा है।

नई दिल्ली में दुनिया के कई शीर्ष नेताओं का एक मंच पर आना भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका को भी रेखांकित करता है। अगले दो दिनों में होने वाली बैठकों और चर्चाओं से कई महत्वपूर्ण वैश्विक और द्विपक्षीय मुद्दों पर नए रास्ते निकलने की उम्मीद की जा रही है।

कुल मिलाकर, 12-13 सितंबर 2026 को होने वाला 18वां BRICS शिखर सम्मेलन भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण आयोजन है। भारत मंडपम में होने वाली इस बैठक पर दुनिया की नजर है, क्योंकि यहां लिए जाने वाले फैसले और नेताओं के बीच होने वाली चर्चाएं आने वाले समय में वैश्विक सहयोग, व्यापार, ऊर्जा और बहुपक्षीय व्यवस्था की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं।

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