नई दिल्ली: भारत में एथेनॉल उत्पादन क्षमता में तेजी से हुए विस्तार के बाद अब उद्योग के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। देश में एथेनॉल बनाने की क्षमता बढ़कर करीब 20 अरब लीटर हो चुकी है, जबकि मौजूदा मांग इसके मुकाबले काफी कम है। अनुमान के मुताबिक करीब 7 अरब लीटर उत्पादन क्षमता के लिए फिलहाल स्पष्ट बाजार उपलब्ध नहीं है। ऐसे में एथेनॉल उत्पादक कंपनियां नए खरीदारों, निर्यात बाजारों और पेट्रोल-डीजल के अलावा इसके दूसरे उपयोगों की संभावनाएं तलाश रही हैं।

Writer by Mohit Kumar 

29-9-2026 11:55 pm

‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश में इस साल करीब 4 अरब लीटर अतिरिक्त एथेनॉल उत्पादन क्षमता जुड़ने की उम्मीद है। इससे आने वाले समय में अधिशेष क्षमता की समस्या और बढ़ सकती है।

E20 ब्लेंडिंग से पूरी क्षमता का इस्तेमाल मुश्किल

भारत के मौजूदा E20 ब्लेंडिंग कार्यक्रम के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाने के लिए सालाना करीब 11 अरब लीटर एथेनॉल की आवश्यकता होती है। इसके अलावा शराब, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन और अन्य गैर-ईंधन क्षेत्रों में करीब 3 से 3.5 अरब लीटर एथेनॉल की खपत होती है।

इन आंकड़ों को देखते हुए वर्तमान मांग देश की कुल स्थापित उत्पादन क्षमता को पूरी तरह इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उद्योग से जुड़े अधिकारियों का अनुमान है कि एथेनॉल संयंत्रों की क्षमता का इस्तेमाल आने वाले तीन वर्षों में लगभग 65 से 75 प्रतिशत के बीच रह सकता है।

महाराष्ट्र में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बताई जा रही है। यहां करीब 2.77 अरब लीटर एथेनॉल अधिशेष रहने का अनुमान है। इससे उत्पादकों पर नए बाजार तलाशने का दबाव बढ़ गया है।

E25 और E30 ब्लेंडिंग पर फिलहाल आगे नहीं बढ़ी सरकार

एथेनॉल की अतिरिक्त क्षमता के बीच पेट्रोल में E20 से आगे बढ़कर E25 या E30 ब्लेंडिंग करने की चर्चा भी होती रही है। हालांकि, उपभोक्ताओं और वाहन क्षेत्र की ओर से E20 को लेकर उठाई गई चिंताओं के बीच सरकार ने फिलहाल उच्च ब्लेंडिंग स्तर को तत्काल अनिवार्य करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ने का फैसला किया है।

मौजूदा रोडमैप के अनुसार 31 अक्टूबर 2026 तक एथेनॉल ब्लेंडिंग की सीमा E20 पर बनी हुई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी कहा है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के दीर्घकालिक प्रभावों की तस्वीर वर्ष 2027 तक अधिक स्पष्ट हो सकती है।

अलग-अलग ब्लेंड के लिए अलग कीमत का सुझाव

एथेनॉल की मांग बढ़ाने के लिए उद्योग की ओर से अलग-अलग विकल्प भी सुझाए जा रहे हैं। Wilo India के मुख्य बिक्री अधिकारी रविंद्र उटगीकर ने सुझाव दिया है कि सभी वाहनों के लिए एक समान ब्लेंड अनिवार्य करने के बजाय E10, E20 और E85 जैसे अलग-अलग मिश्रणों के लिए अलग कीमत व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।

इस व्यवस्था में वाहन मालिक अपने वाहन की उम्र, इंजन तकनीक और ईंधन अनुकूलता के आधार पर विकल्प चुन सकते हैं। उद्योग का मानना है कि इससे एथेनॉल के इस्तेमाल के लिए एक अधिक लचीला बाजार तैयार हो सकता है।

निर्यात से मिल सकती है सीमित राहत

घरेलू बाजार में मांग सीमित रहने के कारण एथेनॉल उत्पादकों की नजर अब विदेशी बाजारों पर भी है। हालांकि, निर्यात के रास्ते में भी कई सीमाएं हैं।

पहली पीढ़ी यानी 1G एथेनॉल के निर्यात पर फिलहाल प्रतिबंध हैं, जबकि सितंबर 2025 से भारत ने दूसरी पीढ़ी यानी 2G एथेनॉल के निर्यात की अनुमति दी है। गैर-ईंधन उपयोग वाले एथेनॉल की कुछ मात्रा तंजानिया, अंगोला और केन्या जैसे बाजारों में भेजी जा रही है।

वहीं, ग्रेन एथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) नेपाल को संभावित आपूर्ति को लेकर चर्चा कर रहा है। नेपाल में 10 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग को अनिवार्य करने की योजना है, लेकिन वहां पर्याप्त फीडस्टॉक और डिस्टिलेशन क्षमता की कमी बताई जा रही है। ऐसे में भारतीय उत्पादकों के लिए नेपाल एक संभावित बाजार बन सकता है।

डीजल में एथेनॉल आधारित उत्पादों की संभावना

उद्योग अब केवल पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने तक सीमित नहीं रहना चाहता। एथेनॉल से बने अन्य जैव-ईंधन उत्पादों को डीजल क्षेत्र में इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर भी काम चल रहा है।

प्राज इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक आशीष गायकवाड़ के अनुसार, कंपनी की बायो-आइसोब्यूटेनॉल (Bio-IBA) तकनीक व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार है। कंपनी को वित्त वर्ष 2026-27 की मौजूदा तिमाही में पहला ऑर्डर मिलने की उम्मीद है।

उनका कहना है कि भारत में पेट्रोल की तुलना में डीजल की मांग काफी अधिक है। ऐसे में डीजल में Bio-IBA की ब्लेंडिंग जैव ईंधन उद्योग के लिए बड़ा अवसर बन सकती है। उनके मुताबिक यदि डीजल में सिर्फ 2 प्रतिशत Bio-IBA ब्लेंडिंग अनिवार्य की जाती है तो इससे 3,000 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट अवसर पैदा हो सकते हैं।

शराब और फार्मा सेक्टर भी बड़ा बाजार

एथेनॉल की मांग केवल ईंधन क्षेत्र तक सीमित नहीं है। शराब, फार्मास्यूटिकल्स और प्रयोगशाला जैसे क्षेत्रों में भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, गैर-ईंधन उपयोग के लिए इस्तेमाल होने वाला अनडिनैचर्ड एथेनॉल कुल मांग का करीब 18.7 प्रतिशत है। वहीं, एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल यानी ENA का बाजार वर्ष 2025 में करीब 3.80 अरब लीटर तक पहुंच गया था। यह बाजार लगभग 5 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है।

देशी शराब की तुलना में इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) की ओर उपभोक्ताओं के बढ़ते रुझान को ENA की मांग में वृद्धि का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

अब उद्योग के सामने बाजार विस्तार की चुनौती

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में एथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाने और पेट्रोल में इसकी ब्लेंडिंग को बढ़ावा देने पर काफी जोर दिया है। इसका उद्देश्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना, किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार तैयार करना और जैव ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ाना रहा है।

लेकिन उत्पादन क्षमता के तेजी से विस्तार ने अब उद्योग के सामने मांग और आपूर्ति के संतुलन की चुनौती खड़ी कर दी है। जब तक घरेलू ब्लेंडिंग को मौजूदा E20 स्तर से आगे नहीं बढ़ाया जाता या एथेनॉल के नए औद्योगिक उपयोग तेजी से विकसित नहीं होते, तब तक अतिरिक्त क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना मुश्किल रह सकता है।

ऐसे में आने वाले वर्षों में भारत के एथेनॉल उद्योग की दिशा केवल पेट्रोल में ब्लेंडिंग पर निर्भर नहीं रहेगी। निर्यात, गैर-ईंधन उद्योग, नई जैव-ईंधन तकनीक और डीजल जैसे नए क्षेत्रों में इस्तेमाल यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि देश अपनी बढ़ी हुई एथेनॉल उत्पादन क्षमता का कितना प्रभावी उपयोग कर पाता है।

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